* बसन्त है मनभावन *

बसन्त है मनभावन
सुन्दर इसका मुखड़ा
सुन्दर है पहिरावन
इसे देखने कामदेव संग रति आई
नृत्य संग इसे रमणी बनाई
काम क्रीड़ा में लोगों को लिपटाई ,
संतो को भी बहलाए
संत तो सम्भल ही जाते
सरस्वती की शरण में जाते
उनकी कृप्पा से
अपना जीवन सफल बनाते ,
बसन्त न होता
ऐ मुस्कान न होती
सुन्दरता को अभिमान न होती,
ऐ खेत खलिहान बाग-बगीचा
बहती हुई निर्मल सरिता
इनका कोई स्थान न होती ,
ठंढी गर्मी वर्षा का
किसी को पहचान न होती
बसन्त है मन भवन सुन्दर इसका मुखर
सुन्दर है पहिरावन।

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