देश प्रेम का आगाज

जाने कैसे- कैसे दीवाने थे
जो शूली पे चढ़ गये
देश की आन के लिए
अपने आप को मिटा गये |

जाने कितने अरमानों की
वो तो होली खेल गये
अपने अरमानों को कन्धा
वो तो देकर चले गये |

वो तो अजब दीवाने थे
जाने वो कहाँ चले गये
एक आजादी की खातिर
वो तो फांसी पर झूल गये |

हम भी कितनी गद्दारी से
उनकी मौत को भूल गये
अपने स्वार्थ को पूरा करने से
हम सब कुछ अब तो भूल गये |

लूट-लूट कर हमने कितना
अपने घरों को भर डाला
घोटालों पर घोटाले करके
अपने देश को विक्रय कर डाला |

देश भक्तों के नाम पर
नाम भी उनका गिरवी रखा
स्विस बैंक सब भर डाले
फिर भी लोगों में विस्वास रखा |

अब तो इनका न ईमान बचा है
न ही कोई इज्ज़त
अपनों ने ही अपनों के नाम पर
अपनों की बेचीं है इज्ज़त |

किस कदर यहाँ मानव को मानव नोंच रहा है
और इंसान भेड़िया हो रहा है
पैसा- पैसा के नाम पर मानव अब
हर दम अपनों को लूट रहा है |

जाने कैसी लूट मची है
हर तरफ अंधेर मचा है
मार-काट और गुंडा-गर्दी
चारों तरफ हा- हा कर मचा है |

जाने क्यों इंसान-इंसान को
ऐसे हर दम नौंच रहा है
अपने ही अपनों का यहाँ पर
ऐसे दामन चीर रहा है |

न जाने किस प्रगति की खातिर
शहीदों को कलंक लगा रहा है
कभी भूकंप और बम कांड में
हर कोई कमीशन खा रहा है |

ताबूतों के इंतजाम में भी
कोई तो रिश्वत ले रहा है
कोई लाशों के ढेर से भी
लाशों को भी चुरा रहा है |

कोई भूकंप और त्रासदी के नाम पर
चंदा उगाही कर रहा है
भोली – भाली जनता का
खूब विश्वास लूट रहा है |

Kamlesh Sanjida photo
कमलेश संजीदा , गाजियाबाद

One Response

  1. डी. के. निवातिया निवातियाँ डी. के. 03/03/2016

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