अंतर्मन संग बैठक थी रात

अंतर्मन संग बैठक थी रात
वो, मैं और सितारे थे साथ

मेरी शिकायत की सूची थी लम्बी
तो सभा हो गयी थोड़ी जंगी

मन के व्यवहार से हूँ हैरान
हर वक़्त रहता यूँ ही परेशान

मन ने बतलाई अपनी विवशता
कुछ खो देने के भय से डरता

थोड़े बदलो अपने सोच विचार
तारों ने कुछ ऐसा दिया सुझाव
खोना-पाना तो बस एक भ्रमजाल
जिसमे उलझा ये पूरा नर-संसार

हम तारों के संगी-साथी भी
टूट के ऊपर से नीचे गिरते हैं

पर दुख में डूब नहीं जाते
आँसू बहाने के बजाय
अपने पथ पे चलते रहते
दूर आसमान में चमकते दिखते

पाने पे हँसना, खोने पे रोना
बेकार की सोच है नादान
पाना, खोना, हँसना, रोना
बस जीवन्तता की है पहचान

अस्थायित्वता है प्रकृति का राज़
पृथक हो जाएंगे जो हैं साथ-साथ

टहनियों से जब पत्तियां टूट जातीं
सुख कर टहनी
पत्तियों का शोक नहीं मनाती
कुछ महीने बाद
नई-नई, हरी-हटी पत्तियाँ जन्माती

पानी भी नदी में यहाँ से वहां
दूर-दूर तक बहता है
कभी किसी नदी से मिलता
तो कभी बिछड़ता है
पर बस बहता रहता है

नियति ने दी खूबसूरत जिंदगी
रे मन तू इसे खूबसूरती से जी
कभी खोओगे कुछ, कभी पाओगे कुछ
बेवजह सोचकर भी बदल नहीं पाओगे कुछ

बैठक का मैंने लिख लिया विवरण
मैं और मेरा मन रखेंगे स्मरण
बदलते रहना है धरा की प्रकृति
मिल जाएगा हमें जो देगी नियति

2 Comments

  1. Shishir "Madhukar" Shishir "Madhukar" 03/03/2016
  2. डी. के. निवातिया निवातियाँ डी. के. 03/03/2016

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