अँधेरे में किरन (२३ जनवरी १९९९)

अँधेरा भी क्या ,
अँधेरा हुआ करता है
सब कुछ अपने आगोश में ,
छिपा लिया करता है |

हाथ को हाथ ,
न सूझा करता है
जिन्दगी का अँधेरा भी,
कुछ यूँ ही हुआ करता है |

सब अच्छे कर्मों को,
छिपा लिया करता है
और बुराई की ओर,
ले जाया करता है |

अँधेरे में ही,
सारे गोरख धंधे हुआ करते हैं
जो आदमीं को आदमीं से,
दूर किया करते हैं |

अँधेरा जो अच्छे और बुरे की पहचान,
भुला दिया करता है
वो इंसान की इंसान से,
पहिचान छीन लिया करता है |

अँधेरे में भी,
एक प्रकाश की किरन हुआ करती है
जो हमेशा हमारे विवेक को,
जगाया करती है |

लेकिन अँधेरा उस पर,
हावी हुआ करता है
और जो इंसान के विवेक को,
छीन लिया करता है |

बरबादी के रास्ते भी,
अँधेरे ही हुआ करते हैं
जो आबादी से कोसों दूर,
ले जाया करते हैं |

अँधेरे में भी,
जो नहीं भटका करते हैं
अंधेरों में भी,
ऐसे लोग उजाले ढूंडा करते हैं |

वक़्त से जो आदमीं,
घबरा जाया करता है
उसे अँधेरा ही,
हाथ लगा करता है |

वक़्त से भी जो,
लड़ जाया करते हैं
उनको हमेशा ,
उजाले ही मिला करते हैं |

Kamlesh Sanjida photo
कमलेश संजीदा , गाजियाबाद

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