बस हमसे ये गुनाह न हो

बस हमसे ये गुनाह न हो मोहब्बत वेपनाह न हो
तुझे वाहों मे समेट लूँ अगर तू हमसे खफा न हो

मौका नही मिलता उनसे जिक्रे मोहब्बत करने का
जुबान हमारी कह भी दे नजरो की अगर ह्या न हो

चुराकर हमने तुमको ख्आवो मे लाकर बसा लिया
अब वो ख्आव मेरे रहें अधूरें जिसमें तेरी वफा न हो

ख्आवो को सूरज ढल चला अब तो सुबह होने ही दो
वो मेरी सुबह ही क्या जिसमे तेरा नशा न हो

दो पल मिले है इश्क के इन्हें इस तरह गुजार दें
मैं ना तुझसे खफा रहूँ तू भी मुझ से खफा न हो

कुछ यूँ मिलें हम उस वक्त साँसों मे महक भी घुल गयी
दोनो की चाहत इस तरह थी अब इसमे कोई सदा न हो

ना तुम बोलो न हम बोलें ये मुलाकात यूँ ही रहें
निगाहो की वाते हो रही है अब इसमे जुबां न हो

5 Comments

  1. Shishir "Madhukar" Shishir "Madhukar" 01/03/2016
    • Nirdesh Kudeshiya 02/03/2016
  2. हेमन्त'मोहन' 02/03/2016
    • Nirdesh Kudeshiya 02/03/2016
  3. डी. के. निवातिया निवातियाँ डी. के. 02/03/2016

Leave a Reply