सरकारी तंत्र ( ५ मई २०१२)

जैसे ही नौकरी मिली, सरकार को समर्पण कर बैठे
अपना सब कुछ जैसे, गवर्नमेंट को अर्पण कर बैठे
खुशियाँ हर वक़्त, दिल मैं छाने लगीं
और सरकारी तंत्र की, तूती बोलने लगी |

कुछ ही दिनों में, सब ढर्रा समझ आने लगा
अपने को गिरगिट सा, बदलने लगा
नौकर से मालिक, बनने लगा
और जनता को नौकर, समझने लगा |

देश की सेवा करने का, प्रण कर बैठे
और खुद को, सेवक बना बैठे
और जनता को, प्रणाम कर बैठे
और उनकी सेवा ही, अपना धर्म मान बैठे |

डेली नए हुक्म, चलने लगे
जनता को ठगने के,नए-नए पैंतरे बदलने लगे
हर बात में रोड़ा, अटकाने लगे
और पैसे लेते ही, सब भूल जाने लगे |

पैसे नहीं तो क्या-क्या, याद आने लगे
हर कागज, अधूरे लगने लगें
खामियां ही खामियां, नज़र आने लगें
और कागज के लिए, नए कागज मगाने लगें |

हर चपरासी भी, आफिसर होने लगे
साहब सा हुक्म, झाड़ने लगे
वो भी अपने आप को, साहब समझने लगे
सरकारी नौकर का, रोआब झाड़ने लगे |

बिन पैसे जैसे ही साहब से
मिलने की गुजारिश करी
साहब बिजी हैं, आज नहीं मिलेंगे
और मुझे कल का रास्ता दिखलाया |

मैंने जैसे ही, सौ की पती दिखलाई
साहब अन्दर हैं, का फरमान सुनाया
जैसे ही थोड़ी देर में, मेरा नंबर आया
साहब ने चपरासी से, बात करने को समझाया |

इस पर भी, मुझे समझ नहीं आया
और बाहर आकर, चपरासी से बतलाया
सौ-सौ की, पाँच पती दे जायो
और कल अपना, कागज ले जायो |

मैंने जैसे ही अपने जानने वाले का
चपरासी को रेफरेंस बतलाया
चपरासी ने मुझको समझाया
और मुझको बाहर का रास्ता दिखलाया |

मैंने भी एक नंबर घुमाया
और सब हाल समझाया
इस पर उसने भी, मुझको समझाया
और बड़े साहब से, मिलने का रास्ता दिखलाया |

और फिर, शिफारिश का फ़ोन करवाया
मिलने का मौका, फोरन आया
इस पर साहब को, गुस्सा आया
तुमने ही, मेरी कम्प्लेंट करवाया |

इस पर मैं समझ नहीं पाया
और मैंने अपने मांमले को उलझाया
इस पर साहब ने, मेरे साहब को समझया
और फ़ोन पर ही क्या-क्या बतलाया |

और जिससे मैंने फ़ोन करवाया
उसने ही मुझे फ़ोन पर खूब धमकाया
सौ की पती को जब बचाया
तो हजार में अब काम निपटाया |

सब बचाने के चक्कर में, मैंने हज़ार गवाये
सरकारी तंत्र, अब मेरी समझ में आया
जैसे- जैसे मैंने, अपना काम करवाया
वैसे- वैसे मैंने, हज़ारों गवाये |

कुछ दिनों बाद फिर, उसी तरह का काम आया
मैंने सब बचाने का, प्लान बनाया
और सबसे बड़े ईमानदार अफसर को फ़ोन घुमाया
मैंने सब कुछ उसको समझाया |

उसने तुरंत मिलने का टाइम बतलाया
इस पर मुझे अपने आप पर गर्व आया
और बेकार में ही मैंने पहले हज़ार गवाया
और सोच-सोच कर पछताया |

और जैसे ही, मैं वहां पंहुचा
दूसरा चपरासी भी, गुस्से में आया
और उसने कहा साहब ने बुलाया
मैं भी खूब रौब से अन्दर आया |

साहब ने कुर्सी का इशारा करवाया
और कोल्ड ड्रिंक का आर्डर भिजवाया
साहब ने खूब प्यार से हाथ फहराया
और सब हाल मुझसे उगलवाया |

थोड़ी देर में कोल्ड ड्रिंक का गिलास आया
मैंने खूब मजा ले-ले कर बतलाया
और अपना हाँथ आगे बढाया
साहब को अपना नया कागज थमाया |

साहब ने बड़े चॉव से कागज देखा
और पिछली फाइल का रेफरेंस माँगा
मैंने भी पिछला कागज निकाला
और साहब को थमाया |

अब तो मेरे मन में, नया -नया ख्याल आया
पिछले हज़ार वापस आने का रास्ता नज़र आया
इस पर साहब ने घंटी बजाया
चपरासी घंटी सुन कर अन्दर आया |

जी साहब आपने मुझे बुलाया
गुप्ता जी से १३१ नम्बर की फाइल को मंगवाया
मैंने दिल में खूब खुशी मनाया
गुप्ता जी मेरे ख्यालों में रोता नज़र आया |

साहब मांफ कर दो
मैं दो हजार देता हूँ
आगे से गलती न करने का
वचन देता हूँ |

कुछ देर ऐसे ही ख्यालों में खोया
गुप्ता जी के कर्मों का हिसाब मैंने लगाया
मन ही मन खूब लड्डू खाया
एक हज़ार के दो हज़ार मिलते पाया |

गुप्ता जी फाइल लेकर आये
साहब ने भी फाइल का मुआयना करवाया
गुप्ता जी आपने यह काम मुझसे कितने में करवाया
साहब पाँच सौ में आप से करवाया |

बांकी पाँच सौ हिसाब से बटवाया
आगे से इस काम के रेट पांच हज़ार करवाओ
ढाई हज़ार मेरे
बांकी हिसाब से बटवाओ |

इस फाइल को, मैं कैंसल करता हूँ
और इन पर, दस हज़ार का जुर्माना लगता हूँ
ये सुन कर, मेरे होश उड़ गए
और गॅस खा कर, वहीँ गिर गए |

थोड़ी देर में, सब कागज मेरे पास आ गए
पिछले काम के, दस हज़ार कहाँ से लाऊ
और कागज, कैसे बनवाऊ
ये सोच -२ कर, हर वक़्त घबराऊ |

काम बनवाने गया था, बिगड़वा आया
इस पर, बीबी को गुस्सा आया
उसने साड़ियों का, हिसाब समझाया
और गहनों का, उधार बताया |

ये सब सुन कर, चक्कर आया
मुझे अपनी इमानदारी पर, गुस्सा आया
बीबी ने फिर, मुझे समझाया
समय के साथ चलने का, पाठ पढाया |

और बोला पेनालिटी के दस हज़ार, कहाँ से लाऊ
ये सब, बीबी को बतलाया
उसने बैंक से, लोन लेने को बतलाया
बीबी ने, उम्मींद की किरण को दिखलाया |

बैंक में एक क्लर्क से लोन अमोंट बतलाया
क्लर्क ने झट से केलकुलेटर निकाला
लोन की रकम सात हज़ार बाताया
और दस हज़ार पर रिसीव करवाया |

इस पर मै बोला, बांकी तीन हज़ार तो दो
क्लर्क ने उसे, प्रोसेसिंग फीस बतलाया
और नार्मल सोलह प्रतिशत का, ब्याज बतलाया
और गारंटी के लिए मकान गिरवीं रखवाया |

मैं ये सब देख कर, हैरान रह गया
और सोच- सोच कर, परेशान हो गया
कैसे इंसान एक दूसरे को नोंच रहा है
और जानवरों से भी बद्तर हो रहा है |

जिन्दगी भी किस कदर, चक्कर खाने लगी
हम भी किसी महकमे के मुलाजिम थे
और अब महकमे से महकमे में जाने लगे
और यहाँ से वहाँ, चक्कर लगाने लगे |

कमलेश संजीदा , गाजियाबाद