आज का नेता (१७ जनवरी २००६)

नेता बना ऐसा कि, लेता चला गया
गरीब की झोली में, आँसू भरता चला गया
न बस चला तो, उसका भी खून बहा दिया
गद्दार साबित करके, एन्काउन्टर करवा दिया |

पैसे की भूँक न जाने कहाँ ले जायेगी
देश भक्त को भी, जो गद्दार का चोला पहिनायेगी
आजादी के परवानों को भी दर किनारा करेगी
गरीबी की रोटी के भी, घोटाले करेगी |

हर कोई उसी होड़ में, बढता जा रहा है
हर कोई अपने आप को, नेता बना रहा है
घोटालों के देश में, घोटाला करा रहा है
आँखों के नीचे से, काजल चुरा रहा है |

अपनी ही जेबों को, हर कोई भरता जा रहा है
पसीने की कमाई को, छीनता जा रहा है
आँसू जिसके पास हैं, बस अफ़सोस कर राह है
महेनत की कमाई पर, शिकंजे कसते जा रहा है |

गरीबों की हालत अब तो, बद्तर हो रही है
गरीबों के हर एक फंड, को नेता खा रहा है
और कमीसन के नाम पर, हर एक फंड बिक रहा है
और देश का खजाना, हर वक्त खाली हो रहा है |

कर्ज की दीवारे, दिन प्रतिदिन बढती जा रही हैं
और गरीबी की कमर को, तोडती जा रही हैं
बिक रहा है, देश कोई खरीदेगा
फिर अपना ही कोई, इसको उजाडेगा I

ये कैसी है आँधी जो, बढ़ी जा रही है
तूफ़ान बनकर, डटे जा रही है
इंसानियत को धूल में, मिलाती जा रही है
और रफ्ता-रफ्ता, सब सहे जा रही है |

कोई यहाँ पर, डरा जा रहा है
और खौफ के आलंम में, जिये जा रहा है
न जाने कैसे वो, चले जा रहा है
और किस ओर हर दम, बढ़ा जा रहा है |

पता नहीं फिर भी, चला जा रहा है
सांसों पे सांसे, लिए जा रहा है
ये कैसा है मंजर, कहाँ जा रहा है
हर कोई अपने आप से, गिरता जा रहा है |

ये देखो वो अपनी हस्ती, खोता जा रहा है
इंसान ये हैवान, होता जा रहा है
अपनी ही मर्यादा, खोता जा रहा है
और अपने को धूल में, मिलाता जा रहा है |

दौलत की चर्बी, ये कैसी चढ़ी
इंसान की भूंख, फिर से बढ़ी
रुकना न थमना, ऐसी बढ़ी
गरीबी तो हर रोज, सूली पर चढ़ी |

आँखों पर न जाने, कौन सी परत चढ़ी
पैसे की भूंख, न जाने कैसी बढ़ी
दिखती नहीं परत, वो ऐसी चढ़ी
जीवन की जुरूरत, न जाने कैसी बढ़ी |

घिनौनी हरकत, लोगों की बढ़ने लगी
पैसों के लिए लाशें, भी सड़ने लगी
इज्ज़त की धोती, छोटी पड़ने लगी
आँचल मैं छिप कर, गोरी रोने लगी |

इज्ज़त भी सरे आम, बेईज्ज़त होने लगी
इंसानियत की बोली, फिर बुलने लगी
आँचल को संभाल, दूध को बचाने लगी
दरिंदों से अपने को, फिर छुपाने लगी |

Kamlesh Sanjida photo
कमलेश संजीदा , गाजियाबाद

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