प्रधानी

गाँव में चुनावी माहौल है|
दबंगो के हाथों में पिस्तौल है||

घूमते फिरते हैं बनके नबाव|
वोटरों पर बनाते हैं अपना दबाव||

उम्मीदवारों को प्रधानी का बुखार है|
लगता है जैसे गाँव में त्यौहार है||

गली-गली में पंचायत लगी है|
हर दीवार विज्ञापनों से सजी है||

प्रत्याशी पिला रहे हैं वोट के बदले शराब|
लोगों की कर दी है आदत खराब||

सभी बखान कर रहे हैं अपनी ईमानदारी|
मगर वोटरों से नहीं छुपी है उनकी भ्रष्टाचारी||

प्रत्याशी दिखा रहे अपनी-अपनी दम|
नहीं पड़ रहा कोई किसी से कम||

बनके सभी आते हैं वरदाता|
वादा अपना कोई न निभाता||

परस्पर विचार कर रहे हैं मतदाता|
प्रत्याशियों की किस्मत के वही हैं विधाता||

योगेश कुमार 'पवित्रम'

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One Response

  1. Shishir "Madhukar" Shishir "Madhukar" 01/03/2016

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