==* वक्त की मार *== (गजल)

वक्तकी मारसे मै पनाहगार हो गया
सपने देखकर मै गुनहगार हो गया

न थे मंजिल-ए-सुराग लिखे कहीपर
दिलको अपने ही मै मदतगार हो गया

मोहोब्बत ही बाटी सारी उम्र हमने
जाने मगर क्यू मै बेकरार हो गया

अब न कोई उम्मीद-ए-वफ़ा जिंदगी
भरोसेमंद खंजरही आरपार हो गया

फकत एक आरजू ‘शशि’ की चाहत हो
इकरार पर मेरे उनका इनकार हो गया
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शशिकांत शांडिले, नागपुर✍
भ्र. ९९७५९९५४५०
Vakt Ki Mar (Gajal)

5 Comments

  1. Shishir "Madhukar" Shishir "Madhukar" 29/02/2016
  2. डी. के. निवातिया निवातियाँ डी. के. 29/02/2016
  3. शशिकांत शांडिले SD 01/03/2016
  4. jitendra kumar 13/04/2016
  5. शशिकांत शांडिले SD 16/04/2016

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