किताबें और अस्तित्व

किताबों की कहानी, आनी -जानी रही
धूल ऐसी चढी, किताब रोती रही
इंतजार की इम्तहां, होती रही
और पलकें बिछाये , बैठी रही I

जब अस्तित्व ही किताबों का, मिटने लगा
जब अनपढ़ों का शिकंजा, कसने लगा
न पड़ने वाले रहे, न किताबें ही रही
उन किताबों की इज्ज़त, यूँ ही जाती रही I

जिनसे ज्ञान की गंगा, जो बहती रही
और ज्ञान भी गलियों में, यूँ ही भटकता रहा
उनका एक-एक पन्ना, यूँ ही फटता रहा
और लोगों के क़दमों में, आता रहा I

ठोकरें यूँ ही, वो खाती रहीं
यहाँ से वहाँ, बस जाती रहीं
न उनको पढ़ा, न सीखा किसी ने
किताबें अपना, अस्तित्व खोती रहीं I

उनके ज्ञान का मजाक,यूँ ही बनता रहा
सागर भी हिलौरे लेता रहा
साहित्य का परचम न लहरा सका
वो सिसकियाँ यूँ ही भरता रहा I

वो घुट -२ के किताबें, रोती रहीं
और पुस्तकालयों के कोनों में, धूल खाती रहीं
अपनी जवानी को, याद करती रहीं
और जवानी में ही, बूढी होती रहीं I

दिन पे दिन वो तो, बस गिनती रहीं
कौनों मैं पड़ी वो तो सिसकती रहीं
कभी झींगर कभी चूहे कुतरते रहे
और उनका ही भोजन होती रहीं I

कमलेश संजीदा

Kamlesh Sanjida photo

3 Comments

  1. Shishir "Madhukar" Shishir "Madhukar" 29/02/2016
  2. डी. के. निवातिया निवातियाँ डी. के. 29/02/2016

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