तक़दीर

जो दुल्हन की तरह सजी चली आ रही है l
मेरे ख्वावों,ख्यालों की ताबीर है ll

चन्द ऱोज पहले हम गए थे उसके शहर में,
और अपना सर्वस्व लुटा कर आ गए थे l
बो दिल्कश आवाज़ बो ढेर सारी बातें,
बो बिंदास अपनापन बो याद रहने बाली मुलाकातें l
आज बनी पाव कि जंजीर है ll
जो दुल्हन की तरह सजी ———-

जितना जाना है समझा है उसको,
उतना ही उसकी हो गया हूँ l
मैं बना हूँ रॉझा उसके दिल का,
बो बनी मेरे दिल की हीर है ll
जो दुल्हन की तरह सजी ———-

सोचता हूँ यह ख्वाव है या हकीकत,
गर ख्वाव है तो बहुत हसीन है l
और गर यह हकीकत है तो मानता हूँ उस खुदा को
जिस ने हमारे हाथों में खिंची ऐसी लकीर है ll
जो दुल्हन की तरह सजी ———-

भले ही आज मेरा खुद का कोई बजुद नहीं,
फिर भी उमिदें जिन्दा है l
जब कहेगा यह ज़माना वाह !
क्या तक़दीर है ll
जो दुल्हन की तरह सजी ———-

संजीव कालिया

3 Comments

  1. Shishir "Madhukar" Shishir "Madhukar" 28/02/2016
    • sanjeev kalia sanjeev kalia 29/02/2016
  2. डी. के. निवातिया निवातियाँ डी. के. 29/02/2016

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