किताबें

बचपन में पढ़ी –
किताबें ,
अब सुकून नहीं देतीं .

उनके साथ ,
पन्नें पलटते ,
देखे थे ,
मैंने ,
कई सपने .
तरह तरह के
और सारे रंगीन .

अब वक़्त के साथ,
बिखर गए हैं सभी .

पर मज़ा यह है की,
किताबें अब भी हैं मेरे पास,
उन सपनो की तस्कीद लिए,
जो बाँट सकती हैं – सपने ,
मेरे और उनके बच्चों में .

2 Comments

  1. Shishir "Madhukar" Shishir "Madhukar" 28/02/2016
  2. डी. के. निवातिया निवातियाँ डी. के. 29/02/2016

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