सैलाब

कौतुहल था कल मेरे घर में,
कितना है आज बिराना l
बुझी-बुझी सी शमां है हर तरफ़
भटक रहा है परबाना ll

सैलाब क्या आया बहा कर ले गया
मेरे अपनों को, मेरे सपनों को !
मेरी आशाओं पर फिर गया पानी l
जिन्दगी ज़िन्दा लाश हो गई
सोया रहा ज़माना ll
कौतुहल था कल मेरे घर में ————–

किसी कि गोद उजड़ गई,
तो किसी कि छत उखड़ गई
हो गए सब अनाथ l
भूख से बिलखते है बच्चे
है पानी को मोहताज l
दिल खोल कर आगे आओ,
हमें है उजड़ी बस्ती को बसना ll
कौतुहल था कल मेरे घर में ————–

आओं इन आंसुओ को पोंछे,
और फूंके इन के अन्दर जीने की इच्छा l
समेटें बिखरी चारदीवारी,
आबाद करें दफ़न हुआ घराना ll
कौतुहल था कल मेरे घर में ————–

एक बार फिर कुदरत ने हमें आजमाया है,
ज़िन्दगी ज़िन्दा कैसे रहेगी
यह मुल्मंत्र समझाया है,
दस-बीस से फर्क नहीं पड़ता
पुन्य कि वेला है भर पेट पुन्य कमाना ll
कौतुहल था कल मेरे घर में ————–

संजीव कालिया

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