…..अतीत से नोक-झोक ….

भरी दोपहर में सिरहाने बिस्तर पर टेक लगाय था
मीठी निंदिया आँखों में दस्तक दे ही रही थी…
सपने भी आँखों में अंगड़ाइयाँ ले रहीं थी…..
तभी चिलमिलाती धूप सी अतीत की यादें मन को भेदने लगीं…
मानो अंदर ही अंदर वो मुझे डंस रही हो…..
मैंने भी पूछ डाला उससे
तेरी परेशानी क्या है तू रोज मुझे सताती क्यों है ?
क्यूँ मेरे वर्तमान पर अपनी अमावस भरी निगाहें डालते रहती है?
खुद तो तू बर्बाद है …और अपनी बर्बादी का बदला मेरे
पश्मीनाई वर्तमान की चादर से क्यूँ ले रही है ?
अपनी ईर्ष्या की लपटों से उसे क्यूँ जला रही है ?
कहीं ऐसा न हो कि इक दिन हवा अपना रुख बदल ले
और वो लपटें तूझे खुद ही जला जाएं ….
फिर तेरा अवशेष भी न मिल पाएं ….
इतना सुनते ही अतीत की यादें
बिन कुछ कहे उलटे दबे पाँव चली गयी ….
तभी मैं अपने स्वप्न से बाहर आ आया …
आँखें खोली तो मेरा वर्तमान मंद-मंद मुस्कुरा रहा था
और भविष्य से अपने नाते जोड़ रहा था ……!!!!!

2 Comments

  1. डी. के. निवातिया निवातियाँ डी. के. 26/02/2016
  2. Shishir "Madhukar" Shishir "Madhukar" 26/02/2016

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