आदमी बहुत लाचार है

आदमी बहुत लाचार है

ना जाने कहाँ खो गया
जो प्यार था कभी अपने दिलों में
अब तो उलझा रहता है ये मन
कभी टेलीफोन तो कभी बिजली के बिलों में

जब हुई थी शादी तो बड़ी ख़ुशी से मनाया था हनीमून
अब तो चार साल के बाद वही चूस रहा है मेरा खून
श्रीमती जी कहती हैं – आते हुए दस किलो आटा लेते आना
और बनिये का पिछले महीने का बिल चुकाना मत भूल जाना

अब तो हमारे खर्चों में कटौती करके उनके मेकअप का सामान आता है
अन्दर से ये दिल बहुत रोता है, पर बाहर से ये चेहरा मुस्कुराता है
अब तो हम उनके पीछे-पीछे चलते हैं चुनमुन को उठाये हुए गोद में
और कुली से लगते रहते हैं हम किसी भी विशेष रात्रि भोज में

अब तो हर वक्त हर पल मैं बेबस सा लगता हूँ
वो रात को चैन से सोती है,
मैं उनके सामान यानि चुनमुन के साथ जगता हूँ

क्या बताऊँ यारो शादी तो बस एक खट्टा-मीठा आचार है
शादी से पहले तो लार टपकती है, पर शादी के बाद आदमी बहुत लाचार है
सच में आदमी बहुत लाचार है

लेखक : सर्वजीत सिंह
sarvajitg@gmail.com

3 Comments

  1. Shishir "Madhukar" Shishir "Madhukar" 26/02/2016
  2. डी. के. निवातिया निवातियाँ डी. के. 26/02/2016
  3. sarvajit singh sarvajit singh 26/02/2016

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