* मांगने की इन्हें पड़ी *

बात कहू मैं खड़ी,
मांगने की है इन्हे पड़ी।
कर्म-धर्म ऐ भूले ,
अधिकार को सिर्फ ढूंढे।।

पुत्र पिता से हक़ मांगें ,
रिश्ता-नाता न जाने।
गुजारा इनका कैसे हो ,
कष्ट है बड़ी ।।

कोई मांगे आरक्षण ,
कोई मांगे नौकरी।
अपना ही जीवन लागे ,
जिन्हें सर पर रखी टोकड़ी ।।

कोई मांगे पानी ,
कोई मांगे बिजली।
खिड़की दरवाजा बंद है ,
सामत में है जिन्दगी ।।

नेता मांगे वोट ,
विपक्ष मांगे इस्थिपा।
वारे उनके न्यारे हैं ,
जो पहन रखे हैं कोट ।।

जुगत-जुगाड़ ऐ लगाते ,
अलग-अलग तरीका अपनाते।
संगठित हो कर ऐ ,
दबाव भी हैं बनाते ।।

दूसरों का कौन सोचे ,
सभी को अपनी पड़ी।
बात कहू मैं खड़ी
मांगने की है पड़ी ।।

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