ख़ुदगर्ज़ी

सिमट गयी है ज़िंदगी इंसा की अपनी चारदीवारी में

अपने ग़म के अलावा कोई और बात चौखट अब पार नहीं करती

कितनी ख़ुदगर्ज़ी है देखो उसकी फ़िदरत में

कि किसी की मुश्किलें उसकी रूह को बेज़ार नहीं करती

होगी जिस रोज़ क़दर उसे अपने रिश्तों की

कही वक़्त की आँधी सब कुछ तबाह ना कर दे

इतना ग़ुरूर अच्छा नहीं गर समझ ले,क्यूँकि

वक़्त की मार कभी कोई आवाज़ नहीं करती

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