==* सफ़र हो आसाँ *== (गजल)

टूटने लगे पैमाने तकलीफ-ए-हयात के
दिखते है छुपे आँसू सूरत-ए-नकाब के

फितरत न सही इंसान है तेरे अंदर ही
डरना क्यू मनमे है खयाल-ए-ईमान के

भूल जाए दास्ताँ इतनी भी आसां नही
लिखते है सपने हकीकत-ए-शबाब के

गुफ्तगू फकत चार लम्हे शायदही होगी
क़त्ल हुए झेलकर हथियार-ए-गुलाब के

खामोश है जुबाँ यकिनन दिल रो रहा है
समेट रहे यादे आसां सफ़र-ए-ख़्वाब के
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शशिकांत शांडिले, नागपूर SD
भ्र. ९९७५९९५४५०
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2 Comments

  1. डी. के. निवातिया निवातियाँ डी. के. 24/02/2016
  2. शशिकांत शांडिले SD 01/03/2016

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