खुद के अंतर मन में- सोनू सहगम

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-: खुद के अंतर मन में :-

दुनिया में जीने का ,
सलीक़ा ढूंढ़ रहा हूँ ।
खुद के अंतर मन मेँ,
खुद को ही ढूंढ़ रहा हूँ ।।

है कैसा बोझ मुझपर ,
जो महसूस मुझे होता है ।
चलती हुई सांसों पर ,
मानो,एहसान सा होता है ।
बंदिशे न जाने है कैसी ,
बेड़िया पैरोँ में ये कैसी ।
आज़ाद तो बस कहने को,
क़ैद हर पल हो रहा हूँ ।।

मन की बात कहने पर ,
बन जाता हूँ गुन्हेगार ।
सफेद लिबास के पीछे ,
देखता हूँ, होता काला व्यापार ।।
सच , मानो ज़हर बन गया ,
झूठ के सर ,ताज सज गया ।।
मानवता को अपनी सब ,
मानो ,खो बैठे है,
देख, हालात मेरी “सहगम”
खुद के ही अश्कों से भीग रहा हूँ ।।

खुद के अंतर मन मेँ,
खुद को ही ढूंढ़ रहा हूँ ।।

( लेखक :- सोनू सहगम )

14 Comments

  1. Shishir "Madhukar" Shishir "Madhukar" 24/02/2016
    • Sonu Sahgam Sonu Sahgam 24/02/2016
  2. Pratibha 24/02/2016
    • Sonu Sahgam Sonu Sahgam 24/02/2016
  3. डी. के. निवातिया निवातियाँ डी. के. 24/02/2016
    • Sonu Sahgam Sonu Sahgam 24/02/2016
  4. Urmila rawat 24/02/2016
    • Sonu Sahgam Sonu Sahgam 24/02/2016
  5. Sahil 25/02/2016
    • Sonu Sahgam Sonu Sahgam 26/02/2016
  6. Raj k sharma 25/02/2016
    • Sonu Sahgam Sonu Sahgam 26/02/2016
  7. kamal 13/03/2016
    • Sonu Sahgam सोनू सहगम 14/03/2016

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