नज़रिया

हमने जज़्बा ’ए’ मोहब्बत समेट ली ,
जिस दर से भी गुज़रे, खुशियां समेट ली .

यूँ तो ज़ख्मों की कमीं न थी जहाँ में ,
हमने हर दर्द की मलहम समेट ली .

यार नाज़ायज़ है वक़्त की तदबीर सोचना ,
हमने हर लम्हे में जिंदगी समेट ली .

बहुत मन्नतें कर ली खुद की खा.ना में ,
‘राज़ ’ उसने ख़ुदी में ख़ुदाई समेट ली .

ये न था की रंजोगम कुछ कम थे इस तरफ ,
हमने बस दर्द की नसीबी समेट ली

अंदेशा है तेरे साथ ख़ाक हो पाएं ,
पर तेरे साथ उम्र ‘ए ’ रूहानियत समेट ली .

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  1. डी. के. निवातिया निवातियाँ डी. के. 24/02/2016

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