है यकीं तो फिर तैरा कर पत्थर देखो

चाहे तो पीर -पयंबर-कि कलंदर देखो
मौत से छूट सके ना, कि सिकंदर देखो

ये कातिल नर्म बाहें हैं हमारे यार की
सिमट के इनमें खुद ही न जाए मर देखो.

दीखता है अँधेरा ही अँधेरा हर तरफ
जुल्फ-ए- यार लगता गई बिखर देखो

कोई ताकत यकीन से बढ़कर नहीं होती
है यकीं तो फिर तैरा कर पत्थर देखो

अजमेर तो है मरकज कढ़ी-कचौरी का
खाई नहीं कभी तो अब खा कर देखो

राम को राह नहीं देकर के क्या मिला
पानी पानी हुआ जाता है समंदर देखो

‘हिन्दुस्तान’ का लिक्खा तारीख ही समझो
लिख के नहीं मिटाता कभी अक्षर देखो
गंगा धर शर्मा ‘हिंदुस्तान’

2 Comments

  1. Shishir "Madhukar" Shishir "Madhukar" 23/02/2016
  2. डी. के. निवातिया निवातियाँ डी. के. 23/02/2016

Leave a Reply