* कर्ण *

कर्ण जब अंतिम क्षण में था
जीवन का लेखा जोखा सब उसके मन में था,
विधाता के सामने वह प्रश्नों का ढेर लगा दिया।
यह लाजिम भी था वाजिब भी था
लोगों ने उस पर उसके कर्म पर जो प्रश्न उठा दिया ,
वह बोला -“मेरा क्या दोष था , जो
मुझे जन्म लेते ही पानी में बहा दिया
सब ने मुझे शूद्र जाना
मन मेरा मुझे क्षत्रिय माना ,
कुछ लोग जान कर भी क्यों छुपा लिया ,
जब पालन कर्ता मेरा शूद्र था
इसमें मेरा क्या कसूर था
परशुराम को अपना गुरु बनाया
उन्होंने भी क्षत्रिय माना और
मेरे साथ अभिशाप लगा दिया ,
मन से मैं मानता था अपने को क्षत्रिय
हस्तिनापुर के राजकुमारों को द्वंदयुध में
जब ललकारा तो हमें अयोग्य ठहरा दिया ,
सुयोधन कहो या द्वयोधन उसने मेरा साथ दिया
अंग प्रदेश का राज दिया
मैं उसका साथ दिया तो हमें
आतताई बता दिया ,
सोयम्बर में द्वोपति ने जो कहा
उसे किसी ने नही सुना
जब मैं उसकी लाचारी पर हँसा तो हमें
बेशर्मी बता दिया ,
इन्द्र ने मेरा कवच कुण्डल मांगा
माता कुन्ती ने वचन लिया
कृष्ण ने भी छल किया
मैं ने किसी के साथ क्या किया जो
इतिहास में हमें इतना कुर्र बता दिया।
प्रस्तुतकर्ता नरेन्द्र कुमार प

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