* मैं हूँ वेहया *

मैं हूँ वेहया
मैं बेचती हूँ काया
यह मेरी मज़बूरी नहीं
तो शौख भी नहीं ,
हमें इस में अनेकों
तरीके से लाए जाते
झूठ सच बोल
फसाए जाते,
कोई गरीबी का शिकार
कोई मज़बूरी का शिकार
किसी ने हमें ला कर
धकेल दिया बना
अपना महबूबा और प्यार ,
यहाँ है बहुत बड़ा जाल
बहुत लोग हैं माला-माल
हमारे अनेकों प्रकार
यहाँ आते हैं छोटे-बड़े
सेठ-साहूकार ,
सभी नंगा हो
नोचते खसोटते
सियारऔर भेडियो को
पाछे छोड़ दांत निपोड़ते ,
फिर भी मेरा ही नाम
क्यों पड़ा वेहया
हमें भी तो प्राकृति
ने ही बनाया ,
मैं हूँ इसी समाज की
उपज
किसी ने बोया
किसी ने काटा ,
सारे दोष फिर
हम पर ही क्यू आता ,
मैं हूँ वेहया !
मैं हूँ वेहया !!

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