वसंत आगमन

गीत हजारों लिखे गये सब पड़े पुराने
देखो आया फिर बसंत नव गीत सूनाने
मन के अंदर जाने कैसी हूक उठी है
कोई बताए कोयलिया क्यूँ कूक उठी है
वृक्षों ने क्यों वस्त्र पुराने त्याग दिए हैं
नए वस्त्र फिर ऋतु बसंत से मांग लिए हैं
सरसों के ये खेत बोलते कैसी भाषा
किसको रहे पुकार, जगाते से अभिलाषा
टेसू ने भी रक्त वर्ण आमंत्रण भेजा
आ मनुष्य आ, ले अमूल्य सम्पदा ले जा
आम्र वृक्ष में नव ऋतु का है बौर आ रहा
हमें बताने देखो कोई मोर आ रहा
कुसुमाकर ने किस्म किस्म के कुसुम बिखेरे
प्रकृति कसमसा रही प्रणय पाश के घेरे
नर की तो क्या बिसात, चित्त है भंग हो रहा
अंग अंग अनंग संग सत्संग हो रहा
नव उमंग मकरंद भोग निर्द्वंद हो रहा
अंतरंग में क्यों परन्तु है द्वन्द हो रहा
राष्ट्र सुरक्षा सैनिक हिम का भार ढो रहे
कोटि जनों हित वृद्ध प्राण आधार खो रहे
कर्त्तव्य प्रणय के मध्य जहाँ यह जंग छिड़ा हो
वीरों का कैसा हो वसंत, यह प्रश्न खड़ा हो
फिर बसंत का भाव बदल जाना चाहिए
रंग दे बसंती चोला ही फिर गाना चाहिए
बिजली भर देने वाले वो छंद सुनाने
देखो आया फिर बसंत नव गीत सुनाने

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  1. Shishir "Madhukar" Shishir "Madhukar" 16/02/2016

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