आवारापन

क्यों उम्मीदों के समन्दर में
मोहब्बत के एहसास सजा रखे हैं
वह कौन किनारा है
जिसने दुनिया में रिश्ते बचा रखे हैं
हमको मंजिल का पता कहां
दूर वीरानी बस्ती है
पल भर को बना एक किस्सा था
अपना वो मेरा हिस्सा था
मौसम क्यों आंधी बन आया
रूठा सा लगे मुझसे साया
पतझड़ की यह कैसी छाया
आंसू यह मेरे है
फिर क्यों उसकी आंखों में नम आया
जन्नत लोग इसे कहते हैं
खुदा की दुनिया के
जिस्म यहां कई रहते हैं
हर कोई एक खिलौना है
खेल जो बांहों से खेला करते हैं
सरहद यहां किसने देखी
मजहब की भी है अनदेखी
जीता हूं जिस आबो हवा में
लोग मेरा आवारापन कहते हैं।

……….. कमल जोशी ……….

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