प्रेम

चंचल मन के गलियारे में
प्रेम का स्मरण कराती तुम
मीठी सी मुस्कान लिये
कविता का सार बन आती तुम,
बसंत के इस मौसम में
गंगा की निर्मल धार हो तुम
पतझड़ का सूनापन जो आये
पत्तों की सर्द फुहार हो तुम,
छंद हृदय का यह पावन
उत्सव नहीं आकाश हो तुम
मेरे जीवन के आंगन में
ऋतुओं का उल्लास हो तुम।

………. कमल जोशी ………

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  1. डी. के. निवातिया निवातियाँ डी. के. 15/02/2016

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