R.I.P. HANUMAN THAPPA poem by ALOK UPADHYAY

रजाई ओढ़ के सोच रहा हूँ ,
उन्होने बर्फ़ कैसे ओढ़ी होगी..
कितनी बार उम्मीद से ऊपर को देखा होगा,
और अंत में कैसे उम्मीद छोढी होगी..
कितनी बार मर जाने की बात दिल में आई होगी,
कितनी बार अपनो की चाह ने ये बात झिंझोडी होगी..
जिन्दगी को तो अभी ओर बहुत जीना था,
कभी सोचा न था के उम्र इतनी थोड़ी होगी..
देशवासियों मुबारक हो तुम्हें खुशियां जहां भर की,
हमारी तो यहीं अब दिवाली, होली ओर लोहड़ी होगी…R.I.P. HANUMAN THAPPA
by
ALOK UPADHYAY

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