तेरे गीतों की गुंजन हो

तेरे गीतों की गुंजन हो

ले चल मुझको जहाँ
तेरे गीतों की गुंजन हो
तेरे गीतों संग
शब्द अर्थ का संभाषण हो

जहाँ आँसू की सखि आँखें
स्वप्न-नीड़ में खोई हों
या मुस्काती पलकें भी
पलने में बस सोई हों

जहाँ सरस सृष्टि का
पावन रस, पुलकित स्पंदन हो
ले चल मुझको जहाँ
तेरे गीतों का गुंजन हो

जहाँ कौतुक क्रीड़ा करती
पायल हो पग में, उर में
या लाज भरे दर्पण-छवि के
कंपित कंगन हो कर में

चातक, चाँद, चकोर
चाँदनी और चिर चिंतन हो
ले चल मुझको जहाँ
तेरे गीतों का गुंजन हो

चंचल, चपल चरणों में चिर
चलने की कुछ आहट हो
साँसों का पथ की गति सा
रुक रुक चलने का हठ हो

जहाँ मंजिल न सही
पर मन का मौन समर्पण हो
ले चल मुझको जहाँ
तेरे गीतों का गुंजन हो

धधके नहीं घृणा धर्म में
मंदिर, मठ या मस्जिद में
या उठे न कटार कुठार
काम, क्रोध या हिंसा मद में

कर्मांचल में बँधा
भक्तिभाव का अवगुंठन हो
ले चल मुझका जहाँ
तेरे गीतों का गुंजन हो

व्यथा, वेदना, विपदा का
जहाँ सफल विसर्जन हो
या कोमल किलकारी का
बस मोहक शिशु क्रंदन हो

जहाँ दिशायें मौन
पर खग कलरव का विचरण हो
ले चल मुझको जहाँ
तेरे गीतों का गुंजन हो।
—- ——- —- भूपेंद्र कुमार दवे

3 Comments

  1. सुरेन्द्र नाथ सिंह कुशक्षत्रप सुरेन्द्र नाथ सिंह कुशक्षत्रप 20/06/2016
  2. अरुण कुमार तिवारी arun kumar tiwari 20/06/2016
  3. babucm babucm 20/06/2016

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