हे मेरी तुम

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—:::: ‘’ हे मेरी तुम ‘’ ::::—–
एक चौथाई जीवन तो तुमने तनहा – तनहा गुजार दिया ,
अब तो जरा मुस्कुरा लो उनके लिए , जिनको तुमने प्यार किया !
जिनके लिए हँसे तुम , जिनके लिए रोये ,
जिनके लिए वर्षों से हो तुम सपने संजोये !
तुम्हारे उनके लिए सपनो में कोई डाले खलल क्यों …??
आपको उनसे बेइंतहा मुहब्बत है – मुहब्बत है …..रहे !
इसका मलाल हो हमे क्यों ……??
हम तो तुम्हारी यादों के सहारे ही जीवन गुजार देंगे !
कभी ना कहना .. मेरे लिए लिखते हो गजल क्यों ..?? ‘’’
बस तुमसे इतनी सी गुजारिस है कि ,
तू हमेशा ऐसे ही मुस्कुराते रहना ,
तुम्हारी इन मुस्कुराहटों से ना जाने मैं हो जाता हूँ सबल क्यों ….??
मेरे लिए दिव्य हो तुम ,थी , रहोगी दिव्यता की मूरत ,
ना था , ना है , ना होगा कोई मेरे लिए तुमसा ख़ूबसूरत !
मैं तुझे चाहूँ , तुझपे जाँ निसार करूँ , तू ही मेरी मजबूती है !
फिर भी ना मैंने कभी माँगा खुदा से तुझको ,
न कभी कहूँगा कि तुम मेरी हो जरूरत !
हे मेरी तुम ! तुम्हे मैं किस नाम से बुलाऊंगा ,
चाहकर भी मैं तुम्हे भूल ना पाऊंगा !
अब तो हमने भी ठाना है ,कि हम कभी ना भूलेंगे तुम्हे ,
इस जन्म की बात क्या , जन्मों –जन्म तेरी यादों के सहारे जी लेंगे !
तेरी इक मुस्कान भी मेरे कई जन्मों के लिए बहुत है !
तेरी ये यादें ही मेरे जीवन का सबसे बड़ा सुख हैं ……!
……….continued द्वारा ::– संदेप्स कृष्णा (की डायरी से )

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