स्नेह सुगंध – शिशिर “मधुकर”

देखो मेरे अपनों ने फिर मुझ पर ये कैसा अत्याचार किया
दूर कर दिया हर वो रिश्ता जिसने भी मुझको आभार दिया
जीत समझ के इसको अपनी जो दुनियाँ भर में इतराते हैं
अपने ऐसे हर वार से मेरे कोमल हृदय को वो तड़पाते है
प्यार बिना अधिकार से भी जीवन में खुशियाँ ना आती हैं
ऐसे रिश्ते कुछ और नहीं सूखे दीपक की जलती बाती हैं
अपने इस क्षण भंगुर जीवन में इतने भी बंधन मत डालो
दिल के द्वारे खोल के रखो और स्नेह सुगंध को तुम पालो
हर अपनेपन के रिश्ते को गर तुम केवल संशय से देखोगे
संसार की बगियाँ में कैसे तुम फिर चिड़ियों जैसे चहकोगे.

शिशिर “मधुकर”

7 Comments

  1. omendra.shukla omendra.shukla 17/02/2016
    • Shishir "Madhukar" Shishir "Madhukar" 17/02/2016
  2. Meena Bhardwaj Meena bhardwaj 17/02/2016
    • Shishir "Madhukar" Shishir "Madhukar" 17/02/2016
  3. डी. के. निवातिया निवातियाँ डी. के. 18/02/2016
  4. Shishir "Madhukar" Shishir "Madhukar" 18/02/2016
  5. प्रतीक 20/02/2016

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