गजल

गजल

बेजान बनाकर चल दिए जो मेरी ही जान थी
कैसे कहूँ उसे बेवफ़ा जो मेरी ही ईमान थी

जिस्म था वो मेरी मै तो बस एक छावँ था
बैठी जैसे अनजान हो जो मेरी ही पहिचान थी

मांग लेती अंगूठा मेरी तेरा ही तो एक्लभ्य था
तीर भी चलायी उस से जो मेरी ही कमान थी

न गीता और क़ुरान पढ़ा होंठो में था उनका नाम
पाँव तले रौंदा उसने जो मेरी ही सम्मान थी

न सवाल था कोई धर्म का न समाज का था बंधन
नाघ चली क्यों लक्षमण रेखा जो मेरी ही निशान थी
१४-०५-२०१५
हरि पौडेल

Leave a Reply