हुस्न-ए-यार

ठहरी हुई सांसें मेरी आवारा कर गयी
खुश्बू तेरे एहसास की जो मुझको छू गयी

रंग-ए-सफ़ेद पैरहन में लिपटी हुई मूरत
काली सियाह रातों में एक नूर भर गयी

संगमरमर सरीखे उँगलियों की वो इक छुअन
पत्थर सिफ़त जेहन को मेरे मोम कर गयी

आराइश-ए-जमाल में मशरूफ हुस्न-ए-यार
तरतीब-ए-क़तल का सामान कर गयी

2 Comments

  1. omendra.shukla omendra.shukla 11/02/2016
  2. Dr. Nitin Kumar pandey Dr. Nitin Kumar pandey 11/02/2016

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