इतना वक़्त कहाँ…

फिर लौट चलूं मैं,”बचपन” मे,
पर अब है,इतना वक़्त कहाँ…
खेलूँ फिर से,उस “आँगन” मे,
पर अब है,इतना वक़्त कहाँ…

क्या दिन थें वो,ख्वाबों जैसे,
क्या ठाट थें वो,नवाबों जैसे…
फिर लौट चलूं,उस “भोलेपन” मे,
पर अब है,इतना वक़्त कहाँ…

हर रोज था,खुशियों का मेला,
हर रात थी,सपनों की महेफिल…
फिर लौट चलूं,उस “सावन” मे,
पर अब है,इतना वक़्त कहाँ…

कोई पहेरा न था,बंदिशों का,
जख्म गहेरा न था,रंजिशों का…
फिर लौट चलूं,उस जीवन मे,
पर अब है,इतना वक़्त कहाँ…
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