ग़ज़ल।दीवाने लोग आते थे ।

ग़ज़ल ।दिवाने लोग आते थे ।

जवां साहिल हुआ तन्हा बिताने लोग आते थे ।
ग़मो से ठोकरें पाकर दिवाने लोग आते थे ।

भले हो दर्द की नौबत मग़र मगरूर थे काफ़ी ।
किये जो इश्क़ में वादे निभाने लोग आते थे ।

दवा-ऐ-दर्द के ख़ातिर मुसाफ़िर वक्त के मारे ।
मिले हर एक ज़ख्मों को दिखाने लोग आते थे ।

खफाई, खौफ ,तन्हाई, जुदाई ,बेकसी लेकर ।
होने रूबरू दिल के बहाने लोग आते थे ।।

इशारे हुश्न भर साकी छलक जाते थे पैमाने ।
छोड़ दुनियां के रंजोगम मयख़ाने लोग आते थे ।

मग़र हालात के चलते वीराना हो गया साहिल ।
लुटी है प्यार की दुनिया ,लुटाने लोग आते थे ।।

दरिया भर गया “रकमिश” बहे जो प्यार में आँसू ।
छुपाकर अश्क़ की लहरें नहाने लोग आते थे ।।

©रकमिश सुल्तानपुरी

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  1. Inder Bhole Nath Inder Bhole Nath 11/02/2016

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