* दिल ढूंढ रहा *

दिल ढूंढ रहा ,घूम रहा अकेला।
चारो ओर नजर डाला तो ,
लगा हुआ है लोगों का मेला ,
सभी अस्त हैं सभी व्यस्त हैं ,
न जाने ऐ भीड़ कैसा कमबख्त है ,
दिल ढूंढ रहा ,घूम रहा अकेला।

यह दिल किसी का न बना
न किसी को अपना बनाया ,
अपनों पराए का दुरी मिटाया ,
फिर भी इसके हाथ कुछ भी न आया ,
दिल ढूंढ रहा ,घूम रहा अकेला।

सुना था लोग जान देते हैं ,
पहचान देते हैं ,
अपने पराए समय पर काम देते हैं ,
समय ही जब फिसल जाए
फिर क्यू ऐ झमेला ,
दिल ढूंढ रहा ,घूम रहा अकेला।

मेरा मानना है कुछ भर्म है कुछ तृष्णा ,
कर्म करो कर्तव्य निभाव ,
भला करो और भूल जाओ ,
खुश रहो मुस्कुराओ ,
न किसी से आश लगाव ,
दिल ढूंढ रहा ,घूम रहा अकेला।

6 Comments

  1. Shishir "Madhukar" Shishir "Madhukar" 10/02/2016
  2. नरेन्द्र कुमार नरेन्द्र कुमार 10/02/2016
  3. डी. के. निवातिया निवातियाँ डी. के. 10/02/2016
  4. नरेन्द्र कुमार नरेन्द्र कुमार 10/02/2016
  5. omendra.shukla omendra.shukla 11/02/2016
  6. नरेन्द्र कुमार नरेन्द्र कुमार 11/02/2016

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