ग़ज़ल।यकीं ख़ुद पे हमारा है ।

ग़ज़ल। यकीं ख़ुद पे हमारा है ।

बिछड़कर जा रहे मुझसे बची यादें सहारा है ।
शरारत से भरे दिन की तरफ मेरा इशारा है ।।

मिले थे हमसफ़र बनकर मग़र जाना तुम्हे होगा ।
हमारी है यही मंजिल तुम्हारा तो किनारा है ।।

यक़ीनन आप जायेंगे तो दिल मेरा भी रोयेगा ।
ख़ुशी तुमको मिले सारी मुझे ये दर्द प्यारा है ।।

हुई जो भूल मुझसे तो उसे तुम दिल पे मत लेना ।
सलीक़ा जो उचित समझा तुम्हे मैंने निखारा है ।।

सजेगी फ़िर यहाँ महफ़िल कभी हम साथ न होंगे ।
मग़र चेहरे पे हर चेहरा लगेगा कि तुम्हारा है ।।

ग़मो के और भी झोंके “रकमिश” हैं तुम्हे सहने ।
मग़र मंजिल मिले तुमको यकीं खुद पे हमारा है ।।

©रकमिश सुल्तानपुरी

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  1. डी. के. निवातिया निवातियाँ डी. के. 10/02/2016

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