राजनीतिकरण

जब भी खुली ऑंखें सभी सोते मिले
खुद को अकेला पा के मैं भी सो गया
काटने को दौड़ती थी शाम जब
इक फुहारा सा उठा और भिगो गया
दोनों किनारों पर हुआ स्वागत मेरा
बीच का पानी मुझे डुबो गया
उपलब्धियां भी बोझ बन जाती रही
जाने कैसे इन्हें अब तक ढो गया
एक अति से दूसरे अति पर गमन
होता रहा, गंतव्य लेकिन खो गया
काश मैं भी अटक जाता प्रश्न पर
पा लिया उत्तर मुसीबत हो गया
हर कदम पर मार्ग नव चुनना पड़ा
राजनीतिकरण मेरा हो गया

3 Comments

  1. Shishir "Madhukar" Shishir "Madhukar" 09/02/2016
  2. डी. के. निवातिया निवातियाँ डी. के. 09/02/2016
  3. शेखर वत्स शेखर वत्स 16/02/2016

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