माँ, मैं सोना चाहता हूँ

माँ, थक गया हूँ मैं
इस जिंदगी के भाग-दौर में, भागते-भागते
अब रुकना चाहता हूँ
थोड़ा बैठना चाहता हूँ
किसी वृक्ष के नीचे आराम करना चाहता हूँ ।

माँ, मैं सोना चाहता हूँ
इतनी गहरी नींद में जो उठ न पाऊं
किसी के जगाए जग न पाऊं
बस आराम ही आराम करता जाऊं ।

जन्म से आज तक तो चलता ही आया
गिरते-पड़ते, हर मुसीबत से बचते-बचाते
अब फंसना चाहता हूँ
निकलना चाहता हूँ इस भाग-दौर से ।

अपने घर में रहना चाहता हूँ
तेरी ममता के गोद में सोना चाहता हूँ
कुछ पाना चाहता हूँ
जो छुट गया इस राहों में चलते-चलते ।

पर थक गया हूँ मैं, माँ
चलते-चलते, राह बनाते-बनाते
जिस पेड़ की छाया के नीचे बचपन बिताया
उसके पास जाना चाहता हूँ
पर अब इतनी ताकत ही न रही ।

इसीलिए मैं सोना चाहता हूँ
थोड़ा आराम करना चाहता हूँ
नींद के गोद मेँ फंसना चाहता हूँ
थक गया हूँ मैं, माँ
इसीलिए आब आराम करना चाहता हूँ ।

माँ मैं अब सोना चाहता हूँ ।
.
—–संदीप कुमार सिंह

4 Comments

  1. डी. के. निवातिया निवातियाँ डी. के. 08/02/2016
    • संदीप कुमार सिंह संदीप कुमार सिंह 10/02/2016
  2. shalu verma shalu verma 10/02/2016
    • संदीप कुमार सिंह संदीप कुमार सिंह 10/02/2016

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