प्रेम की पौध – शिशिर “मधुकर”

कोई चाहत मेरी हुई ना पूरी आँखों में दिखता रोष है
बंजर भूमि में फूल ना खिले बोलो ये किसका दोष है
मन में कितनी उम्मीदें लेकर हमने वो बाग़ लगाया था
अपने अमृत को बरसाने पर बादल वहाँ ना आया था
फिर भी हमनें कोशिश की अंकुर फूट ही जाएं कहीं
लेकिन बीजों ने मिट्टी को दिल से अपनाया ही नहीं
अपना उजड़ा बाग़ देखकर मन ही मन में हम रोते हैं
दर्द छुपाने को लोगों से नम दोनों आँखों को धोते हैं
सोचा है ये देश छोड़ अब किसी और दिशा में जाएंगे
फिर से किसी उपजाऊ भूमि में प्रेम की पौध उगाएंगे

शिशिर “मधुकर”

14 Comments

  1. gyanipandit 06/02/2016
    • Shishir "Madhukar" Shishir "Madhukar" 06/02/2016
  2. डी. के. निवातिया निवातियाँ डी. के. 06/02/2016
    • Shishir "Madhukar" Shishir "Madhukar" 06/02/2016
  3. Ravi Vaid 06/02/2016
  4. Shishir "Madhukar" Shishir "Madhukar" 06/02/2016
  5. Meena Bhardwaj Meena bhardwaj 07/02/2016
    • Shishir "Madhukar" Shishir "Madhukar" 07/02/2016
  6. Bimla Dhillon 07/02/2016
  7. Shishir "Madhukar" Shishir "Madhukar" 07/02/2016
  8. Manjusha Manjusha 08/02/2016
  9. Shishir "Madhukar" Shishir "Madhukar" 08/02/2016
  10. YUDHI 10/02/2016
    • Shishir "Madhukar" Shishir "Madhukar" 10/02/2016

Leave a Reply