मुक्तक-“ओस में भीगी इक सुबह” शकुंतला तरार

“ओस में भीगी इक सुबह”

ओस में भीगी-भीगी सी इक सुबह
ठण्ड में ठिठुरी जाती सी इक सुबह
धूप का इक टुकड़ा उसे था डरा रहा
ज़िंदगी ज्यूं गुनगुनाती सी इक सुबह ||
शकुंतला तरार रायपुर (छत्तीसगढ)

3 Comments

  1. डी. के. निवातिया निवातियाँ डी. के. 05/02/2016
    • shakuntala tarar 05/02/2016
  2. Sukhmangal Singh sukhmangal singh 07/02/2016

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