माया तेरी माया – शिशिर “मधुकर”

माया तेरी माया को कुछ कुछ अब हम भी समझे हैं
इस धरती पर सारे मानव बस तेरे खेल में उलझे है
तुझमें मेरी आसक्ति से ही तो नवजीवन की उत्पत्ति है
पैदा होते ही मेरी ये दो आँखें तेरी ममता को तकतीं हैं
जैसे ही यौवन आता है हंसी मन में लहर सी उठतीं हैं
तेरे आगोश की चाहत में मदमस्त जवानियाँ झुकती हैं
बेटी बन जिस दिन से तू मन के घर आँगन में आती है
हर पिता की सारी शक्ति तेरी चिंताओं में लग जाती है
ऐसा वक्त भी आता है जब हमदर्दों की चाहत होती है
पर ऐसी राहों में माया तू बस अक्सर कांटें ही बोती है
जीवन के अंतिम पड़ाव पर इच्छाए ना बाकी बचती है
थकी हुई ये काया माया तब कुछ भी न कर सकती हैं

शिशिर “मधुकर”

6 Comments

  1. डी. के. निवातिया निवातियाँ डी. के. 05/02/2016
    • Shishir "Madhukar" Shishir "Madhukar" 05/02/2016
  2. Meena Bhardwaj Meena bhardwaj 05/02/2016
    • Shishir "Madhukar" Shishir "Madhukar" 05/02/2016
  3. omendra.shukla omendra.shukla 05/02/2016
  4. Shishir "Madhukar" Shishir "Madhukar" 05/02/2016

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