* मन है दर्पण *

मन है दर्पण इसे साफ रखो ,
इसमें न कोई दाग रखो।

मन मस्तिष्क है एक जोड़ी ,
एक घोड़ा तो दूसरी डोरी।
डोरी को अपने हाथ रखो ,
अपने आप पर विश्वास रखो।

मन है दर्पण इसे साफ रखो ,
इसमें न कोई दाग रखो।

मन चमकेगा तन चमकेगा ,
जीवन में रंग बरसेगा।
इसे जितना दृढ़ बनाओगे ,
उतना ही सफलता पाओगे।

मन है दर्पण इसे साफ रखो ,
इसमें न कोई दाग रखो।

मन है मंदिर मन है मस्जिद ,
मन ही चर्च और गुरुद्वारा है।
मन वो पवित्र स्थान है ,
जहाँ ईश्वर का वास है।

मन है दर्पण इसे साफ रखो ,
इसमें न कोई दाग रखो।

मन के हरे हार है ,
मन के जीते जीत।
मन को जैसा बनाओगे ,
वएसे ही मिलेंगे मीत।

मन है दर्पण इसे साफ रखो ,
इसमें न कोई दाग रखो।

दर्पण पर कलई चढ़ाते हैं ,
मन से कलई हटाते हैं।
जिसके मन में कल-छल है ,
वह जगत में सबसे निर्बल है।

मन है दर्पण इसे साफ रखो ,
इसमें न कोई दाग रखो।

नरेन्द्र का बस इतना कहना ,
मन में राग-द्वैष छल-प्रपंच न रखना।
मन निर्मल जगत निर्मल ,
न कोई संताप रखो।

मन है दर्पण इसे साफ रखो ,
इसमें न कोई दाग रखो।

7 Comments

  1. सारांश सागर Sagar 05/02/2016
    • नरेन्द्र कुमार Narendra kumar 05/02/2016
  2. Shishir "Madhukar" Shishir "Madhukar" 05/02/2016
    • नरेन्द्र कुमार Narendra kumar 05/02/2016
  3. डी. के. निवातिया निवातियाँ डी. के. 05/02/2016
    • नरेन्द्र कुमार Narendra kumar 05/02/2016
  4. नरेन्द्र कुमार Narendra kumar 05/02/2016

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