||मँहगाई की मार ||

“प्याज रुलाने को क्या कम था
जो दाल चरम पे है पहुंची
जेब लगी होने है खाली
खर्चों पे भी अब चली है कैंची ,

मिठास भी जाने लगी है अब तो
मुह मोड़के अपनों की खुशियों से
खारे का भी मन हुआ प्रफुल्लित
सम्मान मिला है जो मुश्किलों से ,

घास ,फुस भी अब जीवन में
मचाने को हुंकार खड़ी है
जेबों पर भारी पड़ते सब ये
फिर भी झड़ी इनकी लगी पड़ी है,

दूध ,दही की बात ना पूछो
बन बादशाह बैठे है ये आज
तरसते है लोग इनको अब
मानते है इन्हे सेहत का राज ,

पैसों से जो खाली है
वही यहाँ मलाली है
सुख-दुःख सब पैसों से ही
बिन इनके हर लफ्ज सवाली है ,

2 Comments

  1. डी. के. निवातिया निवातियाँ डी. के. 03/02/2016
  2. omendra.shukla omendra.shukla 04/02/2016

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