सुदामा चरित भाग 12

 

अगनित गज वाजि रथ पालकी समाज,

ब्रजराज महाराज राजन-समाज के।

बानिक विविध बने मंदिर कनक सोहैं,

मानिक जरे से मन मोहें देवतान के।

हिरा लाल ललित झरोखन में झलकत,

किमि किमि झूमर झुलत मुकतान के।

जानी नहिं विपति सुदामा जू की कहाँ गई,

देखिये विधान जदुराय के सुदान के।।116।।

 

 

कहूँ सपनेहूँ सुबरन के महल होते,

पौरि मनि मण्डित कलस कब धरते।

रतन जटित सिंहासन पर बैठिबे को,

कब ये खबास खरे मौपे चौंर ढरते।

देखि राजसामा निज बामा सों सुदामा कह्यो,

कब ये भण्डार मेरे रतनन भरते।

जो पै पतिवरता न देती उपदेश तू तो,

एती कृपा द्वारिकेस मो पैं कब करते।।117।।

 

 

पहरि उठे अम्बर रूचिर सिंहासन पर आय।

बैठे प्रभुता निरखि कै, सुर-पति रह्यो लजाई।।118।।

 

 

कै वह टूटि.सि छानि हती कहाँए कंचन के सब धाम सुहावत।

कै पग में पनही न हती कहँए लै गजराजहु ठाढ़े महावत॥

भूमि कठोर पै रात कटै कहाँए कोमल सेज पै नींद न आवत।

कैं जुरतो नहिं कोदो सवाँ प्रभुए के परताप तै दाख न भावत॥ प्प्११९प्प्।।119।।

 

 

धन्य धन्य जदुवंश – मनि, दीनन पै अनुकूल।

धन्य सुदामा सहित तिय, कहि बरसहिं सुर फूल।।120।।

 

 समाप्त

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