राहगिर

राहगिर हूं मैं राह में, न जाने क्या-2 देख रहा,
हंसे कोई, कोई दर्द में, फिर भी पथ मेरा न थम रहा।
कोई सपनों को सजाता है, इन्हें कोई रेत में दबाता है,
ठहर-सा जाता है वक्त, कोई जब आत्मा बेच खाता है।।

मैं जानता नहीं, कहां और कैसे राह सूनी होगी,
भेद मुझे नहीं कोई, कैसी मंजिल ये पूरी होगी।
कोई विचार मुझे झकोरे तो, मैं निशब्द सा हो जाता हूँ,
जीवन की इस राह में, और पीछे धकेला जाता हूं।।

जब मैं था तो, आस कुछ और पाने की लगती थी,
अब सब है तो, मैं खुद को ढूंढू यही चाह सी बचती है।
खुद को ढूंढों और मस्त रहो, फिर हर राह मंजिल हो जाती है,
कुछ तुम जीओ, कुछ हम जीए, जिंदगी जिंदा सी हो जाती है।।


अरुण जी अग्रवाल

3 Comments

  1. Shishir "Madhukar" Shishir "Madhukar" 03/02/2016
  2. अरुण अग्रवाल अरुण जी अग्रवाल 03/02/2016
  3. डी. के. निवातिया निवातियाँ डी. के. 03/02/2016

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