बचपन

जीवन के कुरूक्षेत्र में
उग आयी दूब घास
बूझ न पाया मन
प्रायश्चित की किसे आस
असंतुष्ट हूं किससे
घर या दफ्तर के किस्से
आंखों में तैरता पानी
सूखे हृदय की मजबूरी बना
बागों में बिखरे फूल
पतझड़ भी है जरूरी
कौन जानें भला
क्या है अनंत सागर
मैं या मन का भ्रम
प्रकाश का भी मान टूटा
अंधकार में जाकर
बचपन को जाना मैंने
जवानी में आकर,
बहारों के मौसम में
पतंगों की डोर थामते हाथ
मजबूरियों में कैद हो गये
हवाओं संग बेफिक्र
लड़ता उड़ता बचपन
तितली बन कहां खो गया
एक दूजे को ढूंढ रहा मैं
नदियों के पानी में
कागज की नाव जहां
दोस्तों ने मिल कर बहाई थी
वह पाठशाला की दीवारें
जो चित्रों में समाई थी
गुरुजी की वो छड़
आज भी कहां भूल पाया
कौन जाने कल सड़क पर
वो ही सहारा बन जाये
बचपन की वो शरारतें
आज खण्डहर सी लगती हैं
कल तक थी जो इमारतें।

……….. कमल जोशी ……….

One Response

  1. डी. के. निवातिया निवातियाँ डी. के. 03/02/2016

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