कुछ और नहीं……….

कुछ और नहीं हमी की तरह है
ये जिंदगी जिंदगी की तरह है

यो न झुका सर हर चैखटों पर
ये आदत बंदगी की तरह है

क्यूं जां लेके घूमता है हथेली पे
ये जूर्रत आशिकी की तरह है

रात ख्वाबों में उससे मुलाकात हुई
उसकी हर बात मौसिकी की तरह है

ळो अब ख्याल गजल बनने ळगे
हर खुशी गम, गम खुशी की तरह है

यूॅ तो चमकते सितारे खूब हैं पर
चाॅद बिन फ़लक में कुछ कमी की तरह है

फिर मयस्सर हुआ मुदृतों बाद मुझको
ये माॅं का आॅचल बिल्कुल जमीं की तरह है

मुझे शहर छोड़ अब घर जाना ही होगा
माॅ से मिलने की चाहत बेखुदी की तरह है

One Response

  1. डी. के. निवातिया निवातियाँ डी. के. 03/02/2016

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