==* खुद सोच *==

कुछ देखले खुदको बदलकर
जाने मगर तू सोचता क्या है
जिम्मेदारी क्या होनी चाहिये
जाने मगर तू करता क्या है

भूल बैठा तू सोचने की ताकत
बस किसी और का जी रहा है
सारा सच है सामने ही मगर
खुदसेही भागता फिर रहा है

दोष देता है हर किसीको मगर
अपना गिरेबां झांकता नही है
हर वक्त लगा कोसने औरोको
अपनी खामिया धूंडता नही है

क्या करेगा बेनाम जिकर ऐसे
जब तेरा कोई अफ़साना नही है
खुदकी नजरो से उठ जरासा
जमानेकी तुझे जरूरत नही है
————**——–
✒शशिकांत शांडिले, नागपूर
भ्रमणध्वनी – ९९७५९९५४५०
Khud Soch

Leave a Reply