तेरे सपने

जल्दी सो जाता हूँ अक्सर, तेरे ख़्वाबों की आस में।
फिर सारी रात गुजर जाती है, बैठे-बैठे पास में।

इक पल में ही वाद हो गये, अगले पल विवाद हो गए।
आँखों ही आँखों में समझो, सारे ही सँवाद हो गए।
वक्त निकलता है जैसे, हंसी खेल उल्लास में।
त्यों सारी रात गुजर जाती है, बैठे-बैठे पास में।

हंसकर देख लिया जो तुमने, मुरझाये से फूल खिल गए।
होकर उदास जो देखा तुमने, रूह के सारे तार हिल गए।
जैसे राधा-कृष्ण समाये, इक दूजे की साँस में।
त्यों सारी रात गुजर जाती है बैठे-बैठे पास में।

राकेश जयहिन्द।