सुदामा चरित भाग 10-1

बसन उतारे जाइ कै, धोवत चरन-सरोज।

चौकी पै छबि देत यौं, जनु तनु धरे मनोज।।96।।

 

 

पहिरि पादुका बिप्र बर, पीढा बैठे जाय।

रति ते अति छवि- आगरी, पति सो हँसि मुसकाय।।97।।

 

 

बिबिध भाँति भोजन धरे, व्यंजन चारि प्रकार।

जोरी पछिओरी सकल, प्रथम कहे नहिं पार।।98।।

 

 

हरिहिं समर्पो कन्त अब, कहो मन्द हँसि वाम।

करि घंटा को नाद त्यों, हरि सपर्पि लै नाम।।99।।

 

 

अगिनि जेंवाय विधान सों, वैस्यदेव करि नेम।

बली काढि जेंवन लगे, करत पवन तिय प्रेम।।100।।

 

 

बार बार पूछति प्रिया, लीजै जो रूचि होइ।

कृस्न- कृपा पूरन सबै, अबै परोसौं सोइ।।101।।

 

 

जेंइ चुके, अँचवन लगे, करन हेतु विश्राम।

रतन जटित पलका-कनक, बुनो सो रेशम दाम।।102।।

 

 

ललित बिछौना, बिरचि कै, पाँयत कसि कै डोरि।

राखे बसन सुसेवकनि, रूचिर अतर सों बोरि।।103।।

 

 

पानदान नेरे धर्यो भरि, बीरा छवि-धाम।

चरन धोय पौढन लगे, करन हेतु विश्राम।।104।।

 

 

कोउ चँवर कोउ बीजना, कोउ सेवत पद चारू।

अति विचित्र भूषन सजे, गज मोतिन के हारू।।105।।

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